Sunday, October 27, 2013

छोटी मोटी नज्में - ३

जूं
सर पर चढ़ा था कबसे,
भागता फिरता था हर कहीं,
खुजली सी रहती थी हर समय।
कितनी दफ़े कुरेदा, 
कितनी दफ़े धोया,
फिर भी निकला नहीं ।
एक दिन भागता हुआ
ठहर गया कहीं -
और लपक लिया मैंने। 
 हाथ आ ही गया आखिर।
नाखून के बीच रखकर
दाब दिया मैंने।
ना खून निकला
न दर्द हुआ
बस एक हलकी सी
"टिक" सी आवाज़ भर आई ।
वो एक लम्हा था वक़्त का -
सर पर चढ़ा था कबसे,
भागता फिरता था हर कहीं …
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फ़सल 
मेरी आँखों को चूमकर तुमने ,
एक सपना बो दिया था उस दिन। 
मैंने भी रोज़ सींची थी ,
आँखों की वो ज़मीन -
  कभी सूखी न रहने दी । 
बहुत दिन हो गए,
पर सपना अभी तक वो उगा नहीं ।
शायद अबकी, 
पानी कुछ ज्यादा खारा था ।  
शायद अबकी, 
कुछ बंजर सी गई है वो ज़मीन ।

Friday, October 18, 2013

तुमसे मिलकर, ऐसा लगा.…

जब से तुझसे मैं मिलने लगी हूँ, 
कुछ कुछ अधूरी सी रहने लगी हूँ।

सिमटती जाती हूँ जितनी तुझमें, 
खुद में उतनी ही बिखरने लगी हूँ।

भूल जाती हूँ मैं अपना ही पता,
गलियों से तेरी जो गुज़रने लगी हूँ। 

तेरे पास जितनी जाती हूँ मैं ,
दूर खुद से उतनी ही रहने लगी हूँ।

दिन गुजारें हैं जबसे खयालों में तेरे ,
खाली रातों से मैं रोज़ कटने लगी हूँ । 

चाहत में तेरी मरना न आया, 
तगाफुल में तेरे जीने लगी हूँ।   

ख़त जो तेरे फिर से पढ़ने लगी हूँ।
शायरी भी कुछ कुछ करने लगी हूँ।।  
   

Monday, October 7, 2013

रात की बात

बात बस इतनी सी है,
कि रात बस इतनी सी है ।
रात जो इतनी सी है,
वो आँख पर अटकी सी है ।

ख्वाब का टुकड़ा है साँसों में अटका ।
चाँद का मुखड़ा भी आस्मां में लटका ।
दे आता है कौन इन रातों को आवाजें ?
दिल की ये बातें कोई ना बता दे !  
शहर में ये ख़ामोशी बस्ती है कैसे ?
होंठों पर उनके ये सजती है कैसे ?
तुम्हीं अब बताओ की जाना कहाँ है ?
जा-जा के ये रातें फिर रूकती है कैसे ?
खाव्बों से पूछो ये क्यों खो गए हैं ?
बादल पर सर रखकर क्यों सो गए हैं ?
ये यादें चौराहों पर लटकी मिलेंगी ।
सुबह होने पर भी भटकती रहेंगी । 
अंगड़ाया आस्मां तो वो तारा भी टूटा,
जिसे समझा था घर वो सहारा भी छूटा।
घुम गए हैं जो नाम, कोई तो लौटा दो, 
रात की बाहों पर उनको गुदवादो । 
कभी तो कहोगे कि अब लौट आओ,
सफ़र के इन छालों को अब तो मिटाओ ।
कही न कभी हों वो बातें सुनाओ।
आँख जो झपकी तो रात फिसल जाएगी ।
रात जो फिसली तो बात गुज़र जाएगी ।
क्योंकि -
बात बस इतनी सी है,
कि रात बस इतनी सी है ।
रात जो इतनी सी है,
वो आँख पर अटकी सी है ।। 

Tuesday, September 3, 2013

बस यूँ हीं

लौट आना फिर उसी सफ़र में, 
जहाँ कभी वो चला नहीं।
भरकर थकान यादों में अपनी, 
जहाँ कभी वो रुका नहीं।
फिर वही ज़िन्दगी को मोड़ते रहना, 
कि कोई कोना कभी चुभे नहीं।
फिर उसी चुभन को रोते रहना,
कि दर्द अब कोई देता नहीं।
राज़ दिल के लबों पर रखना,
और कहना कि कोई सुनता नहीं।
बात गैरों से करते रहना, 
और अपना किसी को कहना नहीं।
चहरे पर रखना ख्वाबों की चादर,
पर आँखों को अपनी ढकना नहीं।
पढ़ते रहना ख्वाब उनके सारे, 
कि सफ़र अभी ये रुका नहीं। 

Wednesday, August 28, 2013

ऑन ड्यूटी

रोज़,
९ बजे सुबह के,
और शाम के ६ बजे।
पास के गिरीजाघर में,
बजते हैं ज़ोर-ज़ोर से घंटे ।
रोज़,
मैं ९ बजे जाता हूँ दफ़्तर, 
और ६ पर लौट आता हूँ घर।
कल,
रविवार की सुबह
अपने समय से,
फिर बज गया 
गिरजाघर का घंटा।
मैं,
बालकनी में बैठा 
गोद में रखकर अखबार,
चाय पी रहा था।
हाँ,
इंसान होने के कुछ तो फायदे हैं ।

Sunday, August 11, 2013

छोटी मोटी नज्में - 2

शाम का नक्शा 
हर रोज़,
जब शाम उतरती है
दिन के शजर से ।
एक नक्शा छोड़ जाती है
बरामदे की दीवार पर मेरे ।
रात भर भटकता हूँ,
उस नक़्शे में दबी
   वक़्त की सुनसान गलियों में । 
कभी तो मिल जाए
वो एक लम्हा, 
जिसे जी कर कभी
मैं कहीं भूल आया हूँ ।


इंतज़ार
इंतज़ार करते रहे वो दोनों,
कभी आग लगेगी इस इंतज़ार को।
जिसकी राख मलकर अपने जिस्म पर,
फिर एक नई चाहत उगा लेंगे दोनों।
पर अब इस भट्टी में इतनी आग कहाँ ?
बस ठंडी आहें जलती हैं।
बरसती हैं जब यादें कहीं,
कोई दबी उम्मीद
फिर फट पड़ती है।


टिंकू की उलझन  
टांग कर बारिशें ,
अपनी छत्री के हैंडल पर वो ।  
दूसरे सिरे से,
खोंचने लगा बादलों को ।
कल रात कहा था अम्मा ने,
मिठाई रख दी है
ऊपर, सिकहर पे । 
अब परेशान बेचारा घूम रहा है । 
कि ये "ऊपर" से 
रस तो टपक रहा है । 
पर मिठाई छुपाई है कहाँ आखिर
इसका पता क्यों नहीं लग रहा है?

Saturday, August 3, 2013

मेलबॉक्स


घर के किसी बूढ़े की तरह, वो मेलबॉक्स हमेशा बाहर बालकनी से अकेला लटका हुआ मिलता है। किसी (रिटायर्ड) बुज़ुर्ग की तरह ही, वो गाँव/घर से आने वाली किसी खबर के इंतज़ार में, अपनी खाली आँखों को सामने की सूनी सड़क पर टिकाए रहता है। ठंड, बरसात, गर्मी- बारह महीने ये किसी हठयोगी की तरह एक पाँव पर खड़ा दिख जाएगा। दोनों ओर कान पर लाल रंग का ऐनक चढ़ाए, हर आने वाले संदेसे को पढ़ने के लिए तत्पर। लोकगीत की किसी बिरहन के जैसे इसका इंतज़ार भी प्राचीन और शाश्वत है। पर अब ज़मीन में धंसी इसकी बुनियाद हिलने लगी है। तेज़ हवा चलने पर कभी कभार ज़रा टेढ़ा हो जाता है। पूरा शहर का शहर गुज़र जाता है इसके सामने से, पर कोई इससे होकर नहीं गुज़रता। कभी कभी एक चिड़िया बैठी देखी है इस पर। शायद वो भी किसी अपने की ख़बर का इंतज़ार करती होगी। इसे देखकर लगता है जैसे अभी किसी भी वक़्त खड़े-खड़े, अपने बगल से छड़ी निकालकर, मोहल्ले के बाकी रिटायर्ड बूढों के संग, सैर पर निकल पड़ेगा। या आवाज़ लगाएगा पास से किसी गुजरने वाले को। और कई बार कह चुकी, किसी बिना मतलब वाली पुरानी बात को, फिर पूरी गंभीरता से दोहराएगा। पहले डाकिया आता था तो शिव मंदिर के बाहर विराजे नंदी बैल की तरह इसे, फूल के रूप में कुछ चिट्ठियां चढ़ा जाता था। अब तो बस क्रेडिट कार्ड के बिल और विज्ञापन ही पढ़ने को मिलते हैं इसे। शायद अब बाज़ार नए ज़माने का मंदिर है। पास का सुपरमार्केट और पीछे की गली वाला अक्यूपंक्चर स्पेशलिस्ट आए दिन कूपन, रिबेट, नयी सेल का संदेसा भिजवा कर बुलाते रहते हैं। ओल्ड फैशन हो चुकी चिट्ठी अब कोई लिखता नहीं। न्यू जनरेशन के एसएमएस इन पुराने बक्सों में आते नहीं।  संदेश सरल हो गए हैं, और रिश्ते संक्षिप्त। इनबॉक्स भी अब आभासी दुनिया के अनजाने रिश्तों के एहसास (पोस्ट्स/नोटीफ़िकेशन, आदि) से भरा पड़ा है। वहां भी किसी अपने की आवाज़ सुनने को नहीं मिलती। सब एक दुसरे को सुनने के इंतज़ार में हैं। पर कोई कुछ कहता नहीं।