Sunday, May 25, 2014
Friday, May 23, 2014
सुनो
सुनो, उठो ।
हमें फिर चलना है ।पर पैरों से नहीं इस बार ।
समय तो कब का
निकल गया अकेले
हम रह गए जकड़े,
लम्हों में इस पार ।
सुनो,
धड़कने भर लेना,
दिल की जेबों में
कि सफर में साँसें
कम पड़ी अगर ।
उधार न देगा
कोई भी हमको
जीवन कितना ही
सस्ता हो उधर ।
सुनो,
ये न पूछना,
कि जाना कहाँ है ?
रास्तों का मुझे पता नहीं ।
अँधेरे झिलमिलाएँ
जुगनुओं से जहाँ,
रेशा रौशनी का मिलेगा वहीं ।
कोई राह मिले 'गर ,
तो मिलना संभलकर,
कोई मोड़ ही उसका मकान होगा ।
नज़र आए जो मंज़िल
तुम रुकना ना तकना
सफ़र ये वार्ना नाकाम होगा ।
सुनो,
थक जाओ जो तुम ,
धड़कनों को मेरी
क़दमों पे अपने
ज़रा बाँध लेना ।
जो गड्ढे दिखे
या दिखे कोई खाई
सपनों से ये कहना
ज़रा साथ देना ।
सुनो,
ये बातें मैं सारी
फिर से कहूँगा ।
हर मंज़िल के पार
जब तुमसे मिलूँगा ।
सफ़र क्योंकि अपना
शुरू तब ही होगा ।
इन शब्दों के आगे
जब कविता लिखूँगा ।।
Saturday, May 17, 2014
लप्रेक - लघु प्रेम कथा
"समंदर को पहले से इतने तय फ्रेमों में देख लिया है, कि अब इसे केवल खाली नज़र से देखना ही अच्छा लगता है । सारी उपमाओं से विरक्त ।"
"समंदर पर घंटों नाव सी अपनी आँखें तैराना, और फिर देखते देखते डूब जाना, मुझे अच्छा लगता है ।"
"हर दूर जाती नाव अपने संग मेरा भी एक हिस्सा ले जाती है ।....ये लहरों पर उड़ते पंछियों को देखकर अजीब लगता है । डर लगता है कोई इनके साथ मुझे एक तस्वीर में क़ैद कर, किसी दीवार पर टांग न दे।"
"लहरें ! लहरें को सुनकर कितनी शांति मिलती है न ?"
"लहरों का शोर ख़ाली पड़े मन को और चिढ़ा जाता है । भीतर की कई गुफ़ाएँ खुलने लगती है।"
"हम्म … "
"पर इतना पानी देखकर सुकून मिलता है कि यहाँ मन का कोई कोना सूखा नहीं बचेगा ।"
"चलो कुछ तो पसंद आया तुम्हें ....ये देखो, यहाँ साहिल और वहाँ क्षितिज । दोनों में कितना फासला है न । फिर भी दोनों कितने जुड़े हुए हैं ।"
"साहिल सत्य है । क्षितिज मिथ्या । "
"और हम ?"
"इस साहिल के पीछे मैं हूँ । और इसके आगे भी मैं । इन दोनों मैं में, दूरी बहुत है । पर सच कहूँ तो ये जानकर अच्छा लगता है ।"
"और हम ?"
"पीछे ज़मीन है । ठोस है । सख़्त है। आगे पानी है। तरल है । भँवर है। .... "
(चुप्पी )
".... तुमने कुछ कहा क्या ?"
"इन सबमें हम कहाँ हैं ?"
"हम यहाँ बीच में , गीली रेत पर । जहाँ पाँव के नीचे से जीवन सरकता जाता है ।जितना बाहर निकलना चाहता है, उतना ही अंदर धँसता चला जाता है। पर हम यहीं है। एक साथ । "
"हाँ । क्षितिज और साहिल जैसे ।"
Tuesday, May 13, 2014
सोलह मई के बाद में
सोलह मई के बाद,
जब भारत भाग्य विधाता
की बदलेगी तक़दीर ।
और जीत का करके दावा,
होगा दिल्ली में तख्तनशी ।
तुम हार कर सब आना,
एक बार फिर वहीं ।
बेताज खामोशी जहाँ,
फिरती है शान से ।
सब तजकर चले आना,
सोलह मई के बाद में ।
चमक रही थी गलियाँ,
जहाँ उजले नारों से ।
धूसर पड़ी हुई है अब,
खाली मटमैले वादों से ।
बचकर आँधी से ज़रा,
बनकर धीमी सी हवा,
( आए जो तरस थोड़ा
वीरानों के हाल पे )
हौले से गुज़र जाना,
सोलह मई के बाद में ।
साऊन्ड बाईट से कटी हुई,
कुछ गुमनाम आवाज़ें खोई हैं ।
अख़बार के जागे पन्नों पर,
अब भी कुछ ख़बरें सोई हैं ।
जो तश्बीर से थी ढकी दरारें
अब सीली पड़ी हैं वो दीवारें
बुनियाद एक चुनकर यहाँ से
बुनियाद एक चुनकर यहाँ से
ले आना तुम बोने वहाँ पे ।
कोई भीड़ जहाँ न जाती हो
ना आवाज़ जीत की आती हो
कोई झूठा वादा कर के कभी
एक नया बहाना कह के अभी ।
कोरे पर्चे पर लिखकर नाम
मेरी हार के वो किस्से तमाम ।
इस भूले से उम्मीदवार को
मत देना अपना याद से,
तुम पर कभी न राज करूँगा,
सोलह मई के बाद में ।
सोलह मई के बाद में ।
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इसे लिखने का आईडिया रवीशजी के एक लप्रेक से आया।किसी ने भेझी थी पढ़ने को। "सोलह मई के बाद " ये फ्रेज वहीं से लिया है।
Thursday, April 24, 2014
ऐसे ही लिख दी
गीली गीली मिट्टी पे,
सूखे मन के पत्ते पर,
छोटी छोटी बूँदों में,
लम्बे गहरे साए हैं ।
ठंडे सीले झोकों में,
तपते जलते रहते हैं,
आधे आधे लम्हों से,
सदियों के सताए हैं ।
सूखे मन के पत्ते पर,
छोटी छोटी बूँदों में,
लम्बे गहरे साए हैं ।
ठंडे सीले झोकों में,
तपते जलते रहते हैं,
आधे आधे लम्हों से,
सदियों के सताए हैं ।
खोई खोई यादों के,
काले चिट्टे बादल भी,
आड़े तिरछे राहों से,
प्यास बुझाने आए हैं ।
हल्की पीली चादर पे,
प्यास बुझाने आए हैं ।
हल्की पीली चादर पे,
सोई सोई छाँव ने,
उड़ते उड़ते भँवरों संग,
उड़ते उड़ते भँवरों संग,
ख़्वाब कई खिलाएँ हैं ।
आधा आधा चंदा है,
अधजगे आकाश में,
पूरा पूरा जलकर भी,
ख़्वाब कई बचाएँ हैं ।
जलती बुझती सड़कों पे,
उजली उजली रातें हैं,
आती जाती राहों में,
ठहरी सिमटी बाहें हैं ।
सुनसान सा शहर है,
तेरी मेरी बातों में ।
गीले सूखे रहते हैं,
सावन की बरसातों में ।
आधा आधा चंदा है,
अधजगे आकाश में,
पूरा पूरा जलकर भी,
ख़्वाब कई बचाएँ हैं ।
जलती बुझती सड़कों पे,
उजली उजली रातें हैं,
आती जाती राहों में,
ठहरी सिमटी बाहें हैं ।
सुनसान सा शहर है,
तेरी मेरी बातों में ।
गीले सूखे रहते हैं,
सावन की बरसातों में ।
Monday, April 21, 2014
नोबल
यूँ भी होता है अक्सर -
कभी मौसम का कोट पहने
समय की दहलीज़ लाँघकर
एक खुश्बू की उँगली थामे,
निकल पड़ता हूँ किसी ख्याल में ।
फिर याद के किसी नुक्कड़ पर,
कोई यार पुराना स्कूल का
मिलता है गेंद हाथ में लिए
साइकिल की पीछली सीट पे ।
साइकिल की पीछली सीट पे ।
और ये शहर अंजाना फिर से
बन जाता है बचपन की गली ।
बन जाता है बचपन की गली ।
कार के रेडियो से जब भी
सुनाई देता है कोई गाना
( गुज़रे ज़माने का, सुना सुनाया )
पहिए, अपने आप मुड़कर
गुज़रने लगते हैं
कुछ मोड़ी हुई राहों से,
कुछ छोड़ी हुई सड़कों पर ।
बारिश की बूँदों में घुला
कई हाथों से छू जाता है
और याद दिलाता है मुझे
उन बीते लम्हों की छुअन का ।
जब भी देखता हूँ
( गुज़रे ज़माने का, सुना सुनाया )
पहिए, अपने आप मुड़कर
गुज़रने लगते हैं
कुछ मोड़ी हुई राहों से,
कुछ छोड़ी हुई सड़कों पर ।
बारिश की बूँदों में घुला
गीत का एक एक लफ्ज़ जैसे
कोई पुराना स्पर्श बनकरकई हाथों से छू जाता है
और याद दिलाता है मुझे
उन बीते लम्हों की छुअन का ।
जब भी देखता हूँ
इवनिंग वॉक पर
ज़िन्दगी की शाम पर खड़े
उन बुज़ुर्ग जोड़ों को
उनके कदमों के जवां निशानों में
देखता हूँ हम दोनों को ।
ज़िन्दगी की शाम पर खड़े
उन बुज़ुर्ग जोड़ों को
उनके कदमों के जवां निशानों में
देखता हूँ हम दोनों को ।
ऐसे ही थामे अपनी अपनी उमर
चल रहे हैं हम किसी पगडंडी पर
जहाँ समय बहुत धीरे बह रहा है
वहीं थोड़ी देर रूक कर
पास बैठी गौरैया को
तुम सुना रही हो शिकायतें
ये जानकर भी कि
उसके घोंसले तक जाने से पहले
जान जाएँगी ये बातें सारी
गिलहरियाँ, पत्ते और फ़ुलवारी ।
चल रहे हैं हम किसी पगडंडी पर
जहाँ समय बहुत धीरे बह रहा है
वहीं थोड़ी देर रूक कर
पास बैठी गौरैया को
तुम सुना रही हो शिकायतें
ये जानकर भी कि
उसके घोंसले तक जाने से पहले
जान जाएँगी ये बातें सारी
गिलहरियाँ, पत्ते और फ़ुलवारी ।
कल पढ़ा था अख़बार में,
कुछ साईंसदान हैं इंतज़ार में
वक़्त को कसने की चाल में
हैं लगे टाईम मशीन के ईजाद में
या नोबेल पाने की फ़िराक़ में ।
मैं यूँहीं हर रोज़ बैठे बिठाए
समय में उड़ता फिरता हूँ ।
कुछ साईंसदान हैं इंतज़ार में
वक़्त को कसने की चाल में
हैं लगे टाईम मशीन के ईजाद में
या नोबेल पाने की फ़िराक़ में ।
मैं यूँहीं हर रोज़ बैठे बिठाए
समय में उड़ता फिरता हूँ ।
मैं कब से अपने नोबल के
इंतज़ार में अकेला बैठा हूँ ।
कोई मेरी बात उन तक पहुंचा दो ।
कोई मुझे मेरा नोबल दिला दो ।
इंतज़ार में अकेला बैठा हूँ ।
कोई मेरी बात उन तक पहुंचा दो ।
कोई मुझे मेरा नोबल दिला दो ।
Saturday, April 12, 2014
सुसाईड नोट
कुछ तो बात रही होगी
जो खुद से न कही होगी ।
आती जाती हर साँस की
हर करवट को चुभी होगी ।
इस तरह वो नीचे
फिर ना जाने मन में क्या आया
तभी एक तेज़ चलती कार से
टकरा गई बेचारी रफ़्तार से
फिर टूट के गिरी उसकी
कांच की खिड़की पर ।
वो बारिश की अटकी बूँद थी
फिर कार चलाने वाले ने
जो खुद से न कही होगी ।
आती जाती हर साँस की
हर करवट को चुभी होगी ।
शाम थी,
वक़्त था,
शायद साढ़े सात का।
वक़्त था,
शायद साढ़े सात का।
वो थी,
मैं था,
मौसम था बरसात का।
मैं था,
मौसम था बरसात का।
कल देखा था उसे आँगन से,
मंडराती मन की उलझन में ।
बिल्डिंग की ऊपरी माले से,
थी घंटों लटकी हुई सी।
बैठी रही वो देर तलक ,
थी कुछ उखड़ी हुई सी ।
बिल्डिंग की ऊपरी माले से,
थी घंटों लटकी हुई सी।
बैठी रही वो देर तलक ,
थी कुछ उखड़ी हुई सी ।
इस तरह वो नीचे
झाँकती थी बार बार
किसी वक़्त की आमद का
था जैसे उसको इंतज़ार ।
कुछ सोच कर टेरिस परथा जैसे उसको इंतज़ार ।
फिर टहल आती थी ।
इंतज़ार में थी किसे के
या यूँ मन बहलाती थी ?
कुछ तो था, जो कहना था
जो उसने भी न समझा था ।
इंतज़ार में थी किसे के
या यूँ मन बहलाती थी ?
कुछ तो था, जो कहना था
जो उसने भी न समझा था ।
फिर ना जाने मन में क्या आया
या देखा उसने कोई साया
या किसी नाऊँमीदी के झोंकें ने
झाँसे में अपने फुसलाया ।
ऊँगली पकड़ किसी सपने की
नीचे कूदी -
जैसे बाहों में किसी अपने की।
चुप चाप हवा से कटते हुए ,
मंज़िल दर मंज़िल मरते हुए
घूमती गिरती जाती थी
नीचे सहमी सड़क पे ।
सांस को हलक में रोके हुए
मैं दुआ में था उस झोंके के
जो ले जाए इसे फिर फलक पे ।
या किसी नाऊँमीदी के झोंकें ने
झाँसे में अपने फुसलाया ।
ऊँगली पकड़ किसी सपने की
नीचे कूदी -
जैसे बाहों में किसी अपने की।
चुप चाप हवा से कटते हुए ,
मंज़िल दर मंज़िल मरते हुए
घूमती गिरती जाती थी
नीचे सहमी सड़क पे ।
सांस को हलक में रोके हुए
मैं दुआ में था उस झोंके के
जो ले जाए इसे फिर फलक पे ।
तभी एक तेज़ चलती कार से
टकरा गई बेचारी रफ़्तार से
फिर टूट के गिरी उसकी
कांच की खिड़की पर ।
वो बारिश की अटकी बूँद थी
जली सावन की सिगड़ी पर ।
फिर कार चलाने वाले ने
बेहरहमी से उसे पोंछ दिया
इस शहर ने फिर एक बार
एक सुसाईड नोट खो दिया ।
एक मौत से अनजान सी ,
एक मौत से अनजान सी ,
वो शाम थी शमशान सी ।
कुछ तो बात रही होगी
जो उस नोट ने कही होगी…
कुछ तो बात रही होगी
जो उस नोट ने कही होगी…
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