Tuesday, September 3, 2013

बस यूँ हीं

लौट आना फिर उसी सफ़र में, 
जहाँ कभी वो चला नहीं।
भरकर थकान यादों में अपनी, 
जहाँ कभी वो रुका नहीं।
फिर वही ज़िन्दगी को मोड़ते रहना, 
कि कोई कोना कभी चुभे नहीं।
फिर उसी चुभन को रोते रहना,
कि दर्द अब कोई देता नहीं।
राज़ दिल के लबों पर रखना,
और कहना कि कोई सुनता नहीं।
बात गैरों से करते रहना, 
और अपना किसी को कहना नहीं।
चहरे पर रखना ख्वाबों की चादर,
पर आँखों को अपनी ढकना नहीं।
पढ़ते रहना ख्वाब उनके सारे, 
कि सफ़र अभी ये रुका नहीं। 

Wednesday, August 28, 2013

ऑन ड्यूटी

रोज़,
९ बजे सुबह के,
और शाम के ६ बजे।
पास के गिरीजाघर में,
बजते हैं ज़ोर-ज़ोर से घंटे ।
रोज़,
मैं ९ बजे जाता हूँ दफ़्तर, 
और ६ पर लौट आता हूँ घर।
कल,
रविवार की सुबह
अपने समय से,
फिर बज गया 
गिरजाघर का घंटा।
मैं,
बालकनी में बैठा 
गोद में रखकर अखबार,
चाय पी रहा था।
हाँ,
इंसान होने के कुछ तो फायदे हैं ।

Sunday, August 11, 2013

छोटी मोटी नज्में - 2

शाम का नक्शा 
हर रोज़,
जब शाम उतरती है
दिन के शजर से ।
एक नक्शा छोड़ जाती है
बरामदे की दीवार पर मेरे ।
रात भर भटकता हूँ,
उस नक़्शे में दबी
   वक़्त की सुनसान गलियों में । 
कभी तो मिल जाए
वो एक लम्हा, 
जिसे जी कर कभी
मैं कहीं भूल आया हूँ ।


इंतज़ार
इंतज़ार करते रहे वो दोनों,
कभी आग लगेगी इस इंतज़ार को।
जिसकी राख मलकर अपने जिस्म पर,
फिर एक नई चाहत उगा लेंगे दोनों।
पर अब इस भट्टी में इतनी आग कहाँ ?
बस ठंडी आहें जलती हैं।
बरसती हैं जब यादें कहीं,
कोई दबी उम्मीद
फिर फट पड़ती है।


टिंकू की उलझन  
टांग कर बारिशें ,
अपनी छत्री के हैंडल पर वो ।  
दूसरे सिरे से,
खोंचने लगा बादलों को ।
कल रात कहा था अम्मा ने,
मिठाई रख दी है
ऊपर, सिकहर पे । 
अब परेशान बेचारा घूम रहा है । 
कि ये "ऊपर" से 
रस तो टपक रहा है । 
पर मिठाई छुपाई है कहाँ आखिर? 
इसका पता क्यों नहीं लग रहा है?

Saturday, August 3, 2013

मेलबॉक्स


घर के किसी बूढ़े की तरह, वो मेलबॉक्स हमेशा बाहर बालकनी से अकेला लटका हुआ मिलता है। किसी (रिटायर्ड) बुज़ुर्ग की तरह ही, वो गाँव/घर से आने वाली किसी खबर के इंतज़ार में, अपनी खाली आँखों को सामने की सूनी सड़क पर टिकाए रहता है। ठंड, बरसात, गर्मी- बारह महीने ये किसी हठयोगी की तरह एक पाँव पर खड़ा दिख जाएगा। दोनों ओर कान पर लाल रंग का ऐनक चढ़ाए, हर आने वाले संदेसे को पढ़ने के लिए तत्पर। लोकगीत की किसी बिरहन के जैसे इसका इंतज़ार भी प्राचीन और शाश्वत है। पर अब ज़मीन में धंसी इसकी बुनियाद हिलने लगी है। तेज़ हवा चलने पर कभी कभार ज़रा टेढ़ा हो जाता है। पूरा शहर का शहर गुज़र जाता है इसके सामने से, पर कोई इससे होकर नहीं गुज़रता। कभी कभी एक चिड़िया बैठी देखी है इस पर। शायद वो भी किसी अपने की ख़बर का इंतज़ार करती होगी। इसे देखकर लगता है जैसे अभी किसी भी वक़्त खड़े-खड़े, अपने बगल से छड़ी निकालकर, मोहल्ले के बाकी रिटायर्ड बूढों के संग, सैर पर निकल पड़ेगा। या आवाज़ लगाएगा पास से किसी गुजरने वाले को। और कई बार कह चुकी, किसी बिना मतलब वाली पुरानी बात को, फिर पूरी गंभीरता से दोहराएगा। पहले डाकिया आता था तो शिव मंदिर के बाहर विराजे नंदी बैल की तरह इसे, फूल के रूप में कुछ चिट्ठियां चढ़ा जाता था। अब तो बस क्रेडिट कार्ड के बिल और विज्ञापन ही पढ़ने को मिलते हैं इसे। शायद अब बाज़ार नए ज़माने का मंदिर है। पास का सुपरमार्केट और पीछे की गली वाला अक्यूपंक्चर स्पेशलिस्ट आए दिन कूपन, रिबेट, नयी सेल का संदेसा भिजवा कर बुलाते रहते हैं। ओल्ड फैशन हो चुकी चिट्ठी अब कोई लिखता नहीं। न्यू जनरेशन के एसएमएस इन पुराने बक्सों में आते नहीं।  संदेश सरल हो गए हैं, और रिश्ते संक्षिप्त। इनबॉक्स भी अब आभासी दुनिया के अनजाने रिश्तों के एहसास (पोस्ट्स/नोटीफ़िकेशन, आदि) से भरा पड़ा है। वहां भी किसी अपने की आवाज़ सुनने को नहीं मिलती। सब एक दुसरे को सुनने के इंतज़ार में हैं। पर कोई कुछ कहता नहीं। 

Sunday, July 21, 2013

बड़बड़ाहट 3

कितनी ही आँखों में ये गोल-गोल, काली रातें तैरती रहती हैं । अपनी अपनी रातें सब ने पलकों में बचाई रखी हैं। सब चाँद को देखते रहते हैं और किसी आशिक की तरह, मौका पाते ही, सपने पलकों के गेट को फांद कर आँखों में चले आते हैं ।सपने भी तरह तरह के होते हैं, जैसे तरह तरह के आशिक होते हैं । कुछ ही सपने अपने होते हैं। कुछ सपने केवल सपने होते हैं । रात टपकती रहती है आसमान से । नींद भीगती रहती है इस बारिश में । डर भी लगा रहता है न जाने कब का बोया सपना आज फूट पड़े । कितनी ही बीती रातों को मिटा देने का मन करता है । कितने ही रातों में मिट जाने का मन करता है । पर कुछ मिटता नहीं । रात बस अपना काला रंग ऊँगलियों पर छोड़ कर फिर उड़ जाती है । रात में, सड़कों पर चलता शोर भी शहर का सपना है । कुछ जगमगाते, कुछ भुजे हुए। कुछ दूर से एक दुसरे को आवाज़ देते हुए । ध्यान से सुनो कभी क्या कहते हैं ये एक दुसरे से । कितनी भी खिड़कियाँ बंद कर लो, कहीं न कहीं से आवाज़ आती रहती है । न जाने अब की ये कौन सी खिड़की बंद कर दी, जो अपनी ही आवाज़ सुनाई नहीं पड़ती । बस शोर ही नज़र आता है । रात का क्या है, कट ही जाएगी । करवटों के मोड़ से गुज़रती हुई, सुबह की चोटी पर पहुँच ही जाएगी । रास्ते में, कुछ सपनों में भीगना होगा । वो भी सुबह की हवा में सूख जाएँगे । पर कुछ सपनों की सीलन, दिन के आने पर भी लगी रह जाती है । कुछ बातें कहानी और कविता के बीच से निकल जाती हैं। कुछ रातें, नींद और सपनों के बीच टंगी रह जाती हैं ।

Friday, July 19, 2013

छोटी मोटी नज्में - १

तिनका 
असमान में उड़ते पंछी से,
गिर गया था एक लम्हा कहीं।
तोड़ लाया था वो जिसे,
एक वक़्त की लरज़ती शाख़ से।
ऐसी ही उड़ती शामों को, 
तनहा, छत पर उतरते देखा है। 
ऐसे ही गिरते तिनकों को, 
दामन में संभाले रखा है।
हर बार ये कोशिश करता हूँ,
इन तिनकों को मिलाकर मैं।
एक घोंसला फिर बना सकूँ,
जो टूट गया था आँधी में।
कुछ तिनके मगर हर बार,
फिर भी कम पड़ जाते हैं ।
कुछ तिनके जो उस बार,
तुम ले गयी थी संग अपने ।

ढलता सूरज 
पेड़ की ऊँची सलाखों के पीछे,
एक रात का मुजरिम खड़ा है।
भाग रहा था जो दिन भर से,
उसे शाम को जाकर पकड़ा है।
जब पहरा देते चाँद को,
रात में झपकी सी लग जाएगी।
आस्मां से लटकती,
तारों की चाभी,
फिर इसके हाथ लग जाएगी।
वही चोर पुलिस का खेल,
कल फिर से खेला जाएगा।
पर आस्मां है ये धरती नहीं,
चोर फिरसे पकड़ा जायेगा।

इंतज़ार 
एक शाम,
दफ्तर से लौटते हुए,
मिल गया वो मुझे।
दोराहे पर खड़ा,
तन्हा, बेमानी, बुझा-बुझा।
लगाए अपनी ठहरी निगाहों को,
उस पीछे को जाते रस्ते पर।
आँखों का सूनापन पोंछकर,
मुझे देखा और मेरा भार -
दफ्तर का सूटकेस,
ले लिया मेरे हाथों से।
फिर निकल पड़ा मेरे संग वो,
नीचे झुकाए अपने सर को -
(शायद कुछ खोज रहा था)
आज का दिन।
मेरे साथ मेरे घर को लौट चला।


साया 
एक हल्की गर्म दोपहरी में,

एक तेज़ हवा के झोंके से।
गिर गई एक छाँव कोई,
उस शाख़ के तिरछे कोने से।
इससे पहले शायर कोई,
रख ले इसको नज्मों में।
पहना दूँ जाकर ये साया,
अपने हमसाए के क़दमों में।

Sunday, July 14, 2013

बिना मीटर की ग़ज़ल - ४

महफ़िल में तेरी बात यूँही चलती रही रातभर,
जा-जा के तेरी याद यूँही रूकती रही रातभर ।१। 

हमबिस्तर हो गए हैं जो कुछ सपने तुम्हारे, 
ठंडी सफ़ेद चादर भी, जलती रही रातभर ।२। 

बहुत संभाले रखा था यादों को तुम्हारी हमने,
क्या हुआ कि आखों से वो, गिरती रही रातभर ।३। 

एक शेर में जो ज़िक्र आ गया उनका कभी,
पूरी ग़ज़ल ही हमारी, महकती रही रातभर ।४।  

कितने सपने बिठाए रखे हैं पलकों पर तुमने,
जो हर बार उठ-उठ कर, झुकती रही रातभर ।५।  

बड़े चैन से सोए थे हम तगाफुल में तेरे,
फिर इक सितम की चाह हमें, चुभती रही रातभर ।६। 

चाँदनी की ठंडक टूटते तारों से पूछो,
जो एक-एक कर शमा को, भुझाती रही रातभर ।७।