Sunday, September 14, 2014

चाँद के पार चलो

कोई तो चाँद होगा,
जो हर शायर से बचा होगा
दाग लगे होगें जिसपे,
पर हर उपमा से धुला होगा ।
उस चाँद को ले आना,
किराए की एक रात में ।
नींद दे रखी है मैंने,
शहर को सौगात में ।

तुम अपनी ही आवाज़ में 
एक कविता बनकर आना ।
गर पहनाए कोई अलंकार,
तो मुक्त छंद हो जाना  । 
मैं अपने ख़ाली लफ़्ज़ लिए
क्षितिज पर लेटा मिलूँगा ।
उधड़े जो ज़मीन-आस्मां,
तो कलम से सीता रहूँगा । 

बंद कर के दोनों दुनिया 
खाली चाँद पर चलेंगे । 
बिन ईंटे, पत्थर, गारे के 
किसी मकान में रहेंगे ।
जहाँ चेहरों की नहीं ,
परछाइयों की बस्ती हो । 
कीमत जहाँ आस्मां की 
ज़मीन से ज़रा सस्ती हो । 

कोई आवाज़ न दे सकेगा  
और बात सब सुनेंगे । 
आकाश से गिरती धूल के
चमकीले सिक्के बुनेंगे ।
एक महीने जितना बड़ा  
चाँद का एक दिन होगा
माने हर दूसरा दिन वहां
पहली तारीख़ सा होगा । 
ऊँमीद की बंजर ज़मीन पर
जब कुछ नहीं उगेगा ।
फेंके सपनों के बीज का,
फिर जी भर पेट भरेगा । 

वहाँ साँसों पे राशन होगा
तो इतना सा कर लेना । 
अपने आधे जीवन को
मेरे आधे में मिला लेना  । 
और धरती को देखकर
जब प्यास कभी लगेगी ।
उनके करवाचौथ के दिन 
अपनी एक नदी बहेगी । 

सड़कों की ज़रुरत नहीं
लम्बी छलांगों में चलेंगे ।
बीच के सारे गड्ढों को
मंज़िलों की राख से भरेंगे ।
वहां हवा नहीं चलेगी
तो राहें कम मुड़ेंगी ।
क़दमों के निशाँ पढ़कर 
सदियाँ अपनी कहानी कहेंगी ।

ये चाँद भी अपने जैसा है
इसके दो दो हिस्से हैं ।
एक उजाला एक अँधेरा
बाकी बीच के किस्से है ।
हम अपना अपना हिस्सा
बिखराते हुए चलेंगें ।
आते जाते वक़्त के पंछी
जी भर कर जिन्हें चुगेंगे ।
तुम पकड़े रहना आस्मां,
मैं नए नक्षत्र बुनूँगा । 
हम दोनों के किस्सों से
जी भर के इन्हें भरूंगा । 

दुनियावाले अगर हमें 
कहने लगे भगोड़ा ।
तुम उनकी ऐसी बातों से 
बिलकुल परेशान न होना । 
जाते जाते धीरे से
बस इतना सा कह देना -
हमारे हल्के लफ़्ज़ों के लिए 
ये ज़मीन बहुत भारी है । 
इसलिए आजकल अपनी 
चाँद पर जाने की तैयारी है ।

Sunday, September 7, 2014

इस रात की सुबह नहीं

भरी भरी सी झील में,
आधे आधे पाँव डुबाए,
दोनों यूँही देर तलक
गीले सूखे बैठे रहे ।
झील में से उगा हुआ
बगुला वो खड़ा हुआ 
हवा और पानी के बीच
घंटों तक बहता रहा ।

आँखों के एक कोने से
झील का ख़ामोश पानी
बगुले का सारा रंग
बूँद बूँद सब पी गया ।
और देखते ही देखते
एक दूसरे पे बिछी हुई
परछाइयों में बसे हुए
उन दो कँधों की वादी में
शाम का सूरज डूब गया ।


फिर उन दो हाथों ने मिल कर
साँझ और शब के बीच
एक छोटा सा पुल बनाया था ।
जिसपे चंद मासूम से लम्हों को
उँगलियाँ थामकर चलाया था ।
जिसे देखने के लिए बगुला
गर्दन ऊँची कर के आता था ।
पँखों को झटकाकर फिर
पुल को और हिलाता था ।

चलते चलाते यूँही
जब थक गए दोनों
और भार सपनों का 
पलकों से, 
धड़कन तक उतर आया था।
वो छोड़कर अपना सिरा
जा मिली दूजे सिरे से ।
और सारे लम्हें बीच के
दबे पाँव चुप चाप -
बगुले के पँखों पर होकर सवार
बुलाने रात को निकल पड़े ।

ऐसे सटकर बैठे थे दोनों
के वादी में उस रात
वक़्त बहुत धीमे गुज़रा था ।
जब सर फिसला था कंधे से
तब तारों के बीच वहाँ
एक चाँद अधूरा लुढ़का था ।

वो रात बहुत लम्बी थी
और तारे बहुत छोटे।
तय हुआ था ये तब
के बारी बारी सब,
अपना-अपना आकाश घुमाकर
कुछ देर झील पर, पसर जाएँगे  ।
और जिन्हें है इंतज़ार
तारों के टूटने का
उन्हें रात भर जगाएँगे ।

एक तरफ वो दोनों
अपनी उड़ान समेटे 
कई क़ायनात भटकते रहे ।
दूसरी तरफ़ वो तारे,
झील की छत पर लेटे,
घंटों आस्मां तकते रहे ।
और देखते रहे उन सैयारों को
जो तलाश में उनकी
गलियां कहकशाओं की छानते रहे । 

तारों को सोता देख
जागता बगुला उन्हें
जैसे ही चुगने जाता था ।
कंकड़ मार पानी में,
दोनों ने तब -
उन तारों को भगाया था ।
रातभर बैठे ज़मीन पे
वो तारे उड़ाते रहे । 
जाने कितनी रातों की
यूँ नीदें जगाते रहे ।
दोनों चुप से बैठे थे इतने
जैसे सब कह दिया था पहले
या कहना चाहा था बहुत कुछ
पर लफ़्ज़ों का भार कौन सहे !

रातभर ये खेल
सब ने मिलकर खेला
पर ठहर गए सब जब
सुबह को आते देखा ।
छूते ही जिसे
रात का आस्मां 
झील में पिघल गया ।
और जाल किरणों का
बिछने से पहले
तारों का झुण्ड उड़ गया ।

पौ फ़टने की आवाज़
जब दोनों को आई थी
पर लौटने की बात
बस एक ने दोहराई थी ।
उस पल लगा झील ने
एक गहरी करवट ली थी,
ख़्वाब देखा था शायद
और अब आँखें खोली थी ।

आखिर जाने वाला चला गया,
सिरा पुल का अधूरा छोड़कर ।
जिससे लटकी रही वो बात
जो चली थी रात रोककर । 
रात के कंकड़, उसके संग
झील किनारे बिखरे थे।
अधूरी किसी ग़ज़ल के जैसे
वो चंद मुरझाए मिसरे थे ।
जब पुल के नीचे
बहता ख़ाली वक़्त
साँस तक भर आया था ।
गुज़रे लम्हों की राख बहा
उसने संदेसा भिजवाया था । 

उस कोरी सी झील में
वो धीमे से अपनी बातें
पानी में बोती रही ।
जिन्हें दूजे किनारे बगुले ने, 
चोंच लगा झील के पर्दे पे 
चुपके से सारी सुन ली ।

उस सुबह, झील में 
वो सफ़ेद बगुला
गेरुई सुबह ओढ़े
एक टाँग पर खड़ा रहा ।
मन्नत माँगी हो जैसे
हवा पे कुछ लिखता रहा । 
वो बिन वादी की सुबह में
एक पहाड़ सी सिमटी रही। 
कई टूटे तारों से बुनी,
कुछ राहें पुरानी चुनती रही ।

Thursday, July 3, 2014

सुसाइड

धड़कन के कहने पे
होठों का खुलना
गहरी किसी प्यास का
फिर गले से उतरना -
एक आते हुए पल ने
ये गौर से देखा था
और जाती हुई साँस पे
एक भार सा रखा था ।
उठाने में जिसे
पलकें कपकपाई थीं
एक ही करवट में जैसे
ज़िंदगियाँ समाई थी ।
कई जन्म लगे थे उसे
इस मुकाम पर आने में
कोशिश बहुत करी थी उसने ,
हर राह को भटकाने में ।
कई बार छिला था उसे
ठंडी नुकीली छाँव ने ।
खुलकर फिर बँध जाती थी
कई बार भवँर सी पाँव में ।

ठान के आया था इस बार
या उसको कोई भरम हुआ ।
रास्तों का ये कारवां
अब शायद यहीं खत्म हुआ ।
सफ़र की लम्बी गहरी,
गलियों में उसने जाना था । 
यहाँ जन्मों तक यूँ भटकना
कुछ लम्हों का हरजाना था ।
पहुँच कर आखिर,
पतली चिकनी
पगडण्डी के छोर पर ।
वो बैठा रहा अकेला
कुछ देर, ज़रा सोचकर ।
फिर बंद कर आँखें अपनी
बैठ अंधेरे की सवारी पे,
एक साँस भरी थी लम्बी
नए सफ़र की तैयारी में ।
पूरा जीवन जैसे,
एक लम्हे में भरना चाहा हो ।
एक अँधेरी सुरँग से उसे 
जैसे कोई बुलाया हो ।
फिर हिम्मत कर उसने
एक बुज़दिल छलांग लगाई थी
उस तरफ को जहाँ पर
ख़ामोशी की गहरी खाई थी ।

न गिरने की आहट हुई 
न मरने का निशां मिला 
एक ख्याल ने आज
फिर खुदखुशी की ।
सुना है सीने में अभी
दफ़नाया है उसे ।

Wednesday, June 25, 2014

मैं कैसे चला जाता

चला जाता मैं कब का 
उन दो कुर्सियों ने गर
कई हाथों से मुझको 
रोका ना होता ।

एक दिन जब
सुबह उठाने में
छलक गई थी चाय
तुमने घबराकर कैसे
अपने शीतल स्पर्श का
बर्नोल लगाया था मुझे ।
कुछ छाले,
जो चाय के छींटों से
जागने लगे थे
वो थामकर
ऊँगली तुम्हारी,
संग मेरे फिर सो गए ।
आज फर्श पर
उस गिरी चाय के
सूखे धब्बे,
बनकर आँसू ,
भरी आँखों से
ताक रहे हैं मुझे ।
आज फिर से,
कुछ छाले
जाग रहे हैं मुझमें 
इन छालों की नींद
तुम्हें देकर,
तुम ही बताओ,
मैं कैसे चला जाता ।

छुट्टी के दिन थे जब
तुम फैलीं थी सुबह सी
मैं दोपहर सा लेटा था
जहाँ खिड़की पे हमारी
एक घोंसला रहता था ।
एक चिड़िया भी थी
जो चूड़ी पर तुम्हारी,
अक्सर झूला करती थी ।
वो अपने पँखों पर लिखकर
उड़ानों के किस्से
उन्हें घर आते जाते,
गिरा जाती थी नीचे ।
जिन्हें तुम दौड़ के
अपनी डायरी में
भर लिया करती थी ।
पूरे अड़तीस दिन हुए
वो चिड़िया तब से
आई नहीं मुझसे मिलने ।
और वो डायरी भी
हर चीज़ की तरह 
ख़ाली पड़ी है  ।
कभी कभी,
एक तिनका आता है बस
सूखे घोंसले से उड़कर
टूटी चूड़ियों को देखकर,
फिर मायूस लौट जाता है ।
कांच के उन टुकड़ों से
चमकती,चुभती यादों को -
उन पर से होकर गुज़री
कई ज़ख़्मी उड़ानों को -
अकेला तड़पता छोड़कर ,
तुम ही बताओ
मैं कैसे चला जाता ।

छत पर बैठे दोनों
दो कुर्सियों के संग
हम चारों के बीच
मैंने आस्मां बिछाया था ।
जिस पर तुम नाज़ुक 
तारे टाँकती थी ।
कितनी धूप लगाई थी
पक्का रंग चढ़ाने में ।
तुम रात रात जागी थी
बादलों को हटाने में । 
जो आते थे उड़ते उड़ते
हमारे तारों को चुगने ।
मैं वक़्त देखकर,
चाँद खसकाता था । 
तुम पलकों से चुनकर,
ओंस बटोरती थी । 

वो सुबह लाने की ज़िद थी
या हमारे आस्मां की हद थी ।
आह भरी थी तुमने,
या कोई हवा चली थी ।
या मैंने ही कोई सिरा,
ज़रा कस के पकड़ा था ।
आँख खुली तो आस्मां
दो हिस्सों में पड़ा था ।
ख्वाहिशों का क़सूर था  
तारों को टूटना ज़रूर था ।
नुकीली किसी बात से
उस सुबह का रंग सूर्ख था ।
तुम एक टुकड़ा लिए
नई उड़ान तलाशने निकल गई।
मैं अपना हिस्सा लिए
पुरानी ज़मीन ढूँढने बैठ गया ।
और वो दो कुर्सियाँ -
ब्लैक होल सी
अंदर किए ज़ब्त
वो सारा गुज़रा वक़्त ,
वैसे ही, वहीं-
आज भी बैठीं हैं ।
मैं उठकर जाना चाहता हूँ
वो बार-बार, 
हर बार, मुझे
अपने अंदर खींच लेती है ।
चला जाता मैं कब का 
उन दो कुर्सियों ने गर
कई हाथों से मुझको 
रोका ना होता ।

छोड़कर खुद को
इतने टुकड़ों में तुम्हारे पास
तुम ही बताओ,
मैं कैसे चला जाता ।

Friday, June 20, 2014

धूम्रपान

कई बार,
मन करता है,
फँसा के सिगरेट
दो उँगलियों में
सटा के होठों से
चुप करा दूँ 
वो सारे खयाल 
जो धुएँ के छल्लों में 
निकलते हैं सीने से ।
हर बार,
सिगरेट बुझाता हूँ
कुछ लम्हों की ऐश, मगर 
रह ही जाती है
उँगलियों पर ।
चाहतों के निकोटीन में
नशा बहुत है ,
पर इसके कैंसर से
मौत नहीं आती ।
हाँ, दवा ज़रूर 
इसकी मगर 
अक्सर जानलेवा होती है । 

Sunday, June 15, 2014

एक ख़त

डिअर,
कल फ़ोन रखते समय तुमने कहा था कि मुझसे मिलने के बाद, तुम अपने अंदर कुछ नया महसूस करने लगे हो । तुम्हारे लिए मैं एक नया जीवन बनकर आई हूँ । उस वक़्त ये सुनकर अच्छा लगा था । और शायद तुम भी मुझसे कुछ ऐसा ही सुनने की आशा कर रहे थे । पर जो मेरे मन में है, उस समय कहना ठीक नहीं लगा । इसलिए अब ख़त लिख रही हूँ ।
मैं चाहती हूँ, तुम मेरे जीवन में सदा एक मौत बनकर रहना । पढ़ने में अजीब लगे, पर तुम्हें लेकर मेरी बस एक यही ख्वाईश है ।
जीवन कितना ही नया हो, एक दिन शरीर के ढीले पड़ जाने पर उसे छोड़ देना ही उसकी नियती है । मौत, पर हमेशा साथ रहती है । तब भी, जब जीवन रहता है । सदा मौजूद होकर भी, वो अपने होने का एहसास कभी नहीं थोपती । जैसे तुम कभी अपने मैं को मुझ पर हावी नहीं होने दोगे । कोई कितना ही मन भटकाए, मौत पर से विश्वास नहीं हिला सकता । जिस रिश्ते की बुनियाद ही ऐसे विश्वास पर टिकी हो, उसे फिर किसका डर ? मौत जीवन का सत्य है । उसका विपरीत नहीं । मैं भी तुम्हें अपना सत्य मानकर, तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ । वो सत्य जो किसी नज़रिए का मोहताज न हो । जीवन के समय से हार जाने पर, तुम मेरा मौत बनकर साथ देना । अगर ऐसा हुआ तो फिर मुझे इस जीवन में किसी का डर नहीं । मौत का भी नहीं ।

तुम्हारा,
नव जीवन  

Saturday, June 14, 2014

बहने दे

ठहर के कुछ देर
बादलों पे,
देख ज़रा -
आस्मां पे ज़मीन
चलती है कैसे ?
रह जाते हैं 
जो निशाँ,
सफ़र के
क़दमों पे ।
राह खोने पे,
मिल जाते हैं कैसे ?

'गर गुज़रो
सावन की अँधेरी
गलियों से,
तो इतना 
याद रखना ।
कुछ बूँदों का 
क़र्ज़
अब भी,
बाकी है तुम पे ।

जो सैर करता
मिल जाए कोई
एक धनक अधूरा -
तुम सा । 
दो पल रुकना
मिलना उससे, 
छोड़कर सारे सिरे । 
संग भर लेना,
कलम में
खुशबू तमाम
रंगों की ।
जो टूट कर 
बूँदों से निकलें 
और फ़िज़ाओं में बहें 
फिर लौटकर आना 
उन्हीं बदरंग से
चंद पन्नों पर। 
और याद कर,
लिखना फिर,
एक वो
भूला हुआ नाम ।
गीले कलम की 
नई छुअन से 
शायद इस बार,
फिर से लाल हो सके -
वो मुरझाया हुआ गुलाब। 

कुछ अधूरी
बातों का कोहरा,
पीछा तुम्हारा 
करने लगे ।
चला हुआ
हर रास्ता, 
फिर होकर तुमसे
गुज़रने लगे ।
और सुरंग 
किसी नज़्म की
आए न जब नज़र ।
यादों पे तुम अपनी,
सावन सा फ़ैलकर।
उमरों की ज़मीन पर
लम्हों सा गिर जाना ।
फट निकले जो आबशार
संग उनके बह जाना ।
बस काटकर कुछ मिट्टी,
एक आसमान सजाना है ।
अपने ही सावन में फिर, 
घुलकर डूब जाना हैं ।

ठहर के कुछ देर
बादलों पे
देख ज़रा -
आस्मां पे ज़मीन
चलती है कैसे ?
बो जाते हैं
जो निशान 
सफर पे
क़दमों से ।
मौसम बदलने पर,
उग आते हैं कैसे ?